मंगलवार, 23 अगस्त 2016

तेंदुलकर से कोहली तक




मैं 90 के दशक में पला बढ़ा हुआ हूँ,जो दशक गवाह रहा है एक एसे क्रिकेट का जो शायद अब तक का सबसे स्वर्णिम दौर कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए,और ऐसा कहने की बजह है मेरे पास एक खिलाड़ी जिसे देख कर हमारे देश मे एक खेल को धर्म और एक खिलाड़ी को उस खेल का भगवान घोषित कर दिया॰मैं भी इन भक्तों की श्रेणी से अछूता नहीं रहा हूँ और आप भी यदि मेरे साथ ही फले फूले हैं तो आप भी इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि वो दौर ही था सचिन तेंदुलकर(मास्टर) के जादू का कब किस किस पर चल गया किसी को पता ही नहीं चला॰
कोई भी नायक उसके खलनायक की बजह से ही सफल होता है,जितना ताकतवर खलनायक नायक उतना ही विराट होकर निकलता है,लेकिन फिल्मों की तरह खेल में कोई नायक और खलनायक नहीं होते और खासकर क्रिकेट में जो कि खेल ही सभ्य लोगों का है,यहाँ बिपक्षी होते हैं और जब विपक्षी शेन वार्न,वसीम अकरम,एलन डोनाल्ड,कोर्टनेय वाल्श,सकलाइन मुश्ताख जैसे हों तो नायक की जीत को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता॰कोई भी खिलाड़ी उसके खेल से ही अमर होता है और कुछ पारियाँ उसके खेल के चरम का एहसास कराती हैं और शदियों तक याद रखी जाती हैं,एक ऐसी ही पारी मेरे जहन में अटकी हुई है सोचा आप सबके साथ साझा करूँ॰
तारीख थी 01 मार्च 2003 दक्षिण अफ्रीका का सेंचुरियन मैदान और चिरप्रतिद्वंदी पाकिस्तान,पाकिस्तान ने अपना लास्ट मैच खेल रहे सईद अनवर की शतक की बदोलत 274 रन का लक्ष्य भारत के सामने रखा था और पाकिस्तान के पास इतिहास की सबसे घातक बोलिंग अटैक वसीम अकरम वकार यूनुस और शोएब अख्तर था,भारतीय फैंस बहुत ही नर्वस फील कर रहे थे और होते भी क्यूँ न उस दौर में 274 रन वो भी तीन सुपर स्टार बॉलर के होते हुए नामुमकिन न सही लेकिन असंभव से थे,लेकिन तेंदुलकर और सेहवाग ने निराश नहीं किया और तबाड़ तोड़ शुरुआत करते हुए भारतीय फेंस को अपनी जगह पर उछलने का मौका दे दिया,सेहवाग ने वकार यूनुस की गेंद पर ऑफ साइड मे छक्का जड़ा तो लोगों की खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा और बाकी कसर तेंदुलकर ने शोएब अख्तर को अपर कट पर छक्का लगा कर पूरी करदी,लेकिन भारतीय फेंस की ये ख़ुशी ज्यादा देर नहीं चली और वकार यूनुस ने बापिसी करते हुए लगातार दो गेंदों पर सेहवाग ओर गांगुली का विकेट ले लिया,पूरे स्टेडियम में मातम छा गया,और बल्लेबाजी करने आए मोहम्मद कैफ अब जरूरत थी एक साझेदारी की और मोहम्मद कैफ ने वही किया स्ट्राइक तेंदुलकर को देते रहे सचिन ने पहले अपनी फिफ्टी पूरी की और बाउंड्री के चारों तरफ स्ट्रोक लगाए और लक्ष्य की और बढ़ते रहे पाकिस्तानी क्रिकेटर और फेंस दोनों ही हतास हो चुके थे,लेकिन अचानक सचिन के मांस पेशियों मे खिचाव आ गया और असहज तेंदुलकर को देख भारतीय समर्थकों के चेहरे पर चिंता साफ देखी जा सकती थी,लेकिन महानायक विषम परिस्थियों में खुद को जलाकर ही महानायक बनते हैं और तेंदुलकर फिर भी नहीं रुके पर जब वो 98 रन 75 बॉलों पर खेल रहे थे वकार यूनुस ने शोएब अख्तर को स्पेल के लिए बापिस बुलाया और एक उठती हुई गेंद जो शायद तेंदुलकर जज नहीं करपाए उनके बल्ले के कंधे को छूती हुई वकार यूनुस के हांथों मे चली गयी और एक महान पारी का अंत हुआ और स्टेडियम शोर से सराबोर था,पाकिस्तानियों के चेहरे पर एक छल की मुस्कान थी,लेकिन तेंदुलकर अपना काम कर चुके थे,उन्होने पारी मे 12 चोके और 1 छक्का लगाया॰बाद में युवराज सिंह और राहुल द्रविड़ ने भारत को 274 के लक्ष्य तक पहुंचाया॰
         सचिन पारी के दौरान अपर कट लागते हुए
अब एक दूसरा पहलू है जहां क्रिकेट पहले जैसा नहीं रहा ज्यादा फास्ट हो गया है या यूं कह लो कि चिरप्रति द्वंदिता उतनी विराट नहीं है,तगड़े गेंदबाजों का अभाव है,एसे दौर में यदि आपकी तुलना तेंदुलकर से होती है तो जरा बेमानी बात होगी लेकिन कुछ भी स्थायी नहीं होता आपकी जगह एक दिन दूसरे को लेनी ही पड़ती है,तेंदुलकर से तुलना होना ही किसी सम्मान से कम नहीं है और जिसकी मैं बात कर रहा हूँ वो इस सम्मान का हकदार भी है,नाम है विराट कोहली 2008 के पदार्पण के बाद से ही मैंने कभी भी कोहली का बेड टाइम नहीं देखा यदि बात केवल लिमिटेड ओवर क्रिकेट की की जाये तो,कोहली अपने प्रतिद्वंदियों से मीलों आगे है सफलता के चरम पर हैं,लेकिन क्या वो सचिन तेंदुलकर से बेहतर हैं? ये मैं वक़्त पर छोडना चाहता हूँ क्यूंकी इस पर लोगों के विचार कभी मेल नहीं खा सकते यह एक बहस का मुद्दा है और होना भी चाहिए क्यूँ कि एक खिलाड़ी जिसने तेंदुलकर को देख कर अपने कैरियर की शुरुआत की और आज उसी तेंदुलकर के साथ उसकी तुलना होती है वो भी 8 साल के क्रिकेट खेलने के बाद क्यूंकी उसके कारनामे ही एसे हैं,मेरे नजरिए में कहें तो विराट कोहली मॉडर्न क्रिकेट के सचिन तेंदुलकर हैं टी20 मे उन्की पारियाँ ये बयान भी करती हैं,लेकिन क्या आज वो गेंदबाज हैं जो पहले हुआ करते थे?इस सवाल को कोई भी क्रिकेट पंडित नकार नहीं सकता,ये स्थिति अंतर द्वंद की है जहां आप किसी के वर्तमान से किसी के भूत की तुलना नहीं कर सकते क्यूंकि हर एक की अपनी अलग यात्रा और कठिनाई होती हैं,लेकिन कुछ ही उस बाधा को पार कर शोहरत और बुलंदी को चूम पाते हैं,विराट कोहली भी एसी ही शख्सियत हैं जिन्हें अंतर के गणित से दूर ही रखा जाए तो बेहतर होगा,उन्हें तेंदुलकर नहीं उन्हें विराट बनना है,उनकी इस विराट यात्रा की शुरुआत हुई थी
28 फरबरी 2012 होबार्ट मैदान ऑस्ट्रेलिया          

भारत ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका के बीच त्रिकोणीय श्रंखला में एक असमंजस की स्थिति थी मैच था भारत और श्रीलंका के बीच जहाँ भारत को श्रंखला मे जीवित रहने के लिए श्रीलंका के द्वारा दिया गया 321 रनों का लक्षय 40 ओवर में पूरा करना था श्रीलंका ने पहले खेलते हुए दिलशान और संगाकारा के शतक की बदौलत 320 रन बनाए थे,जबाब में भारत की तेज शुरुआत हुई और तेंदुलकर सेहवाग तेज रन बनाने के चक्कर में अपना विकेट गवा बैठे, और कोहली और गंभीर के बीच साझेदारी पनपने लगी,लेकिन जो पारी इतिहास में अमर होने वाली थी और कोहली को एक महानतम क्रिकेटर की श्रेणी में खड़ा करने वाली थी अभी बाकी थी,अपनी जादुई फ्लिक और कवर ड्राइव से कोहली ने सारे क्रिकेट जगत का मन मोंह लिया कोहली उसदिन अलग ही रंग में थे अपने ही ज़ोन में थे उन्होने 86 बॉल पर 133 रन की नावाद पारी खेलकर लक्ष्य 36.4 ओवर में ही पूरा कर लिया और विराट कोहली का महानतम बल्लेबाजों की श्रेणी में नाम आ गया,वो पारी हिलादेने वाली किसी आँधी की तरह थी और एक युवा का ऐलान थी कि क्रिकेट में एक और नायक आ चुका है,मलिंगा के एक ओवर में 24 रन इसका संकेत भी बने और कोहली ने उसके बाद भी कई अचंभित पारियाँ खेलीं लेकिन ये एक थी जो मेरे दिल के करीब थी और जो नायक को महानायक बनाने बाली थी,कोहली ने अपनी पारी मे 16 चोके 2 छक्के लगाए॰
    भारत को जीत दिलाकर दहाड़ते विराट कोहली
कोहली के जीवन मे अभी और भी पड़ाव बाकी हैं और इम्तेहान बाकी हैं मुझे भी उसदिन का इंतेजार है जब मैं तेंदुलकर और कोहली कि तुलना कर सकूँ लेकिन सही मायनों में और कह सकूँ कौन बेहतर है॰

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